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पानी पर आम आदमी के हक़ पर नहीं हो कोई दुविधा (GKA) – Gopal Krishna Agarwal

पानी पर आम आदमी के हक़ पर नहीं हो कोई दुविधा

पानी से पेट तो नहीं भरता, लकिन इसके अलावा बिना आप पृथ्वी क्या किसी भी ग्रह पर जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते। जीवन का कोई भी ज्ञात स्वरूप जल के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकता। हमारे अस्तित्व से लेकर प्रगति तक के लिए बेहद जरूरी इस संसाधन के महत्त्व को समझते हुए हमें यह भी देखना होगा कि इसका प्रबंधन कैसे हो, यह हर व्यक्ति तक कैसे पहुंचे और साथ ही इस पर मालिकाना हक किसका हो। इस समय भारत में पानी पर अधिकार को अदालतों के विभिन्न निर्णयों के माध्यम से ही तय किया जा रहा है। देश की शीर्ष अदालतों ने कई बार दोहराया है कि संविधान के अनुच्छेद- 21 के तहत जीवन के अधिकार के रूप में सरकार को देश के सभी नागरिकों को पीने का पानी उपलब्ध कराया जाना चाहिए। यह वाकई महत्त्वपूर्ण है। अब तक सरकार ने पानी के प्रबंधन और वितरण की राह दिखाने के लिए तीन राष्ट्रीय जल नीतियां बनाई हैं। पानी का उपयोग खेती से लेकर कारोबारी गतिविधियों और रिहायशी इलाकों तक किया जाता है। हालाकि ये सभी क्षेत्र एक दूसरे के साथ मुकाबला करते हैं, लेकिन व्यक्तिगत और घरेलू उपयोग के लिए पानी की उपलब्धता एक मानव अधिकार है।

भारत के शहरों में पानी की उपलब्धता मानव अधिकार के लिहाज से भी एक बड़ी चुनौती है। साथ ही यह तेजी से हो रहे शहरीकरण के साथ बुनियादी सेवाओं में गुणवत्ता तलाश रहे नागरिकों की अधीरता का कारण भी है। 2019 तक केवल दो करोड़ घरों में पानी के लिए नल के कनेक्शन थे। अब लगभग 9 करोड़ घरों में नल के पानी की उपलब्धता हो गई है। बेशक, केवल नल से पानी का स्रोत होना अच्छी गुणवत्ता या पर्याप्त मात्रा में पानी की कोई गारंटी नहीं है, फिर भी हर घर जल की योजना बहुत महत्त्वपूर्ण है। जहां पानी की पहुंच ही नहीं है, वहां स्वच्छता की उम्मीद नहीं की जा सकती है। इसलिए पानी के क्षेत्र में काम करने वालों के साथ ही स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए भी जरूरी है कि लोगों तक पानी की बुनियादी पहुंच सुनिश्चित करने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।

हालांकि भारत के संविधान में पानी के अधिकार को स्पष्ट रूप से संरक्षित नहीं किया गया है, लेकिन अदालतों की ओर से इसकी व्याख्या की गई है कि जीवन के अधिकार में पर्याप्त पानी का अधिकार शामिल है। भारत में जल के अधिकार के लिए न्यायिक दृष्टिकोण स्पष्ट है। इसका मूल भाव है कि गरीब से गरीब व्यक्ति को जीवन की बुनियादी सुविधा के लिए जल प्रदान किया जाए । स्वच्छ पेयजल तक पहुंच का संवैधानिक अधिकार भोजन के अधिकार, स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार और स्वास्थ्य के अधिकार से जोड़ा जा सकता है। ये सभी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार के अंतर्गत संरक्षित हैं। संविधान के अनुच्छेद 21 के अलावा, राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में भी समुदाय के भौतिक संसाधनों पर समाज के सभी वर्गों के लिए समान पहुंच के सिद्धांत को मान्यता दी गई है।

भारत में भूजल के अधिकार को भूमि के अधिकार के साथ जोड़ कर देखा जाता है। भारतीय सुगमता अधिनियम, 1882, भूजल के स्वामित्व को भूमि के स्वामित्व से जोड़ता है। इस कानून की परिभाषा यह भी बताती है कि यदि आपका पड़ोसी बहुत अधिक पानी निकालता है और जल स्तर को कम करता है, तो आपको उसे ऐसा करने से रोकने का अधिकार है। इस प्रकार, भूजल के दोहन के किसी व्यक्ति के अधिकार की भी सीमाएं हैं। अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में देखें तो 28 जुलाई 2010 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने स्पष्ट रूप से पानी और स्वच्छता प्रदान करने के मानव अधिकार को मान्यता दी है। साथ ही स्वीकार किया है कि स्वच्छ पेयजल और स्वच्छता का अधिकार मानवाधिकारों की प्राप्ति के लिए आवश्यक हैं।

नई परिस्थितियों में पानी से जुड़े अधिकारों और कानूनों का दायरा काफी व्यापक है। भारतीय न्यायपालिका ने इस लिहाज से सकारात्मक दृष्टिकोण भी अपनाया है, जो अंतरराष्ट्रीय मानदंडों और मानकों के अनुकूल ही है। भारतीय संविधान की समीक्षा करने वाले राष्ट्रीय आयोग ने अपनी रिपोर्ट में पानी के अधिकार संबंधी स्थिति में संवैधानिक प्रावधान के माध्यम से स्पष्टता लाने की जरूरत बताई है। इसके लिए सुरक्षित पेयजल के अधिकार के रूप में एक नए अधिकार को शामिल करने की सिफारिश भी इसने की है। राष्ट्रीय जल कानून 2016 सही दिशा में एक कदम था, लेकिन दुर्भाग्य से यह संसद में पास नहीं हो पाया। पानी के प्रावधान के लिए विभिन्न सरकारों और संस्थाओं के अधिकारों-कर्तव्यों को स्पष्ट रूप से दे रखने वाला कानून समय की आवश्यकता है।

यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि हर व्यक्ति तक आसानी से पानी पहुंच सके|

गोपाल कृष्ण अग्रवाल अध्यक्ष, जलाधिकार फाउंडेशन

युथिका अग्रवाल सहायक प्रोफेसर, अर्थशास्त्र, दिल्ली विश्वविद्यालय