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प्राकृतिक संसाधन पर स्वामित्व सत्ता (GKA) – Gopal Krishna Agarwal

प्राकृतिक संसाधन पर स्वामित्व सत्ता या व्यक्तिगत नहीं बल्कि समाज का ही होना चाहियें – महर्षि वशिष्ठ, राजा विश्वा

परिवर्तन विकास एंव जीवन का प्रतीक है और इसलिए बहुत आवश्यक है। परिवर्तण के परिणाम अच्छे और बुरें दोनो ही हो सकते है। अगर हमारा चितंन सतत रहेगा तो हम सही दिशा में प्रगति के पथ पर अग्रसर होगें अन्यथा भटक जाएगें।विचारों में विश्व को बदलने की शक्ति होती है।

प्रकृति के जो पंचतत्व है वे जीवन की मुलभूत आवश्यकताएं है। इनकी उपलब्धता प्रकृति ने प्रचुर मात्रा में सुनिश्चित की है। लेकिन प्रकृति का शोषण नहीं दोहन किया जाता है। गौपालन के माध्यम से हम इस दोहन की प्रकृया को बहुत अच्छी तरह समझ सकते है।

वैश्विक स्तर पर त्याग, ज्ञान और विचार का महत्व सता के अधिकार से ऊपर ही रहा है। हमारे उपनिषदों में ब्रह्मर्षि वसिष्ट, विश्वामित्र एंव कामधेनु गाय का प्रसंग बहुत प्रमुख्ता से आता है। इस प्रसंग के द्वारा भी दोनो विषय स्पष्ट होते है।

विश्वामित्र अपनी विशाल सेना सहित विजयी होकर अपने राज्य को लौट रहे थे। मार्ग में ब्रह्मा जी के पुत्र महर्षि वशिष्ठ का गुरुकुलमय आश्रम पड़ा। विश्वामित्र ने उनका आशीर्वाद लेने के विचार से आश्रम में प्रवेश किया। महर्षि वशिष्ठ ने राजा के रूप में उनका यथोचित सम्मान किया और कुछ समय आश्रम में रुककर आतिथ्य स्वीकार करने का विनम्र निवेदन किया। विश्वामित्र ने कहा, “आप जैसे तपस्वी ऋषिवर का आतिथ्य स्वीकार करना मेरे लिये गौरव एवं सम्मान की बात होगी, किन्तु मेरे साथ एक लाख से अधिक का सैनिक-समूह तथा काफी संख्या में हाथी-घोड़े हैं। ” इस पर मुनिवर वशिष्ठ ने कहा, “राजन,मेरे इस गुरुकुल में आपको और आपके सैनिक-समूह को किसी प्रकार की असुविधा तथा कष्ट नहीं होगा।

महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में कपिला नामक अलौकिक क्षमता युक्त एक कामधेनु गाय थी, जिससे आश्रम तथा गुरुकुलवासियों को कभी किसी वस्तु का अभाव नहीं हुआ। कामधेनु की अलौकिक क्षमता से आश्रम वासियों की आवश्यकताओं की निर्बाध एवं निरंतर आपूर्ति हो जाती थी। दो दिन तक ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के गुरुकुलमय आश्रम में मिले आदर तथा सत्कार से अभिभूत होकर विश्वामित्र ने कहा, “हम आपके इस आतिथ्य सत्कार के लिये सदैव कृतज्ञ रहेंगे। एक राजा के रूप में तो मुझे आपके गुरुकुल तथा आश्रम को कोई अमूल्य भेंट देनी चाहिए, किन्तु युद्ध से लौटने के कारण यह संभव नहीं है। परन्तु में यह जानने का इच्छुक हुं की आपके गुरुकुल में इतनी सारी व्यलस्थाए कैसे संभव हुई। जिसपर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने उत्तर देते हुए कहा कि हमारे पास एक कामधेनु गाय है जो सभी आवश्यक्ताओं की पुर्ति करती है। यह जानकर विश्वामित्र ने कहा फिर तो इसे हमारे पास होना चाहिए। इसके उत्तर में ऋषिवर ने कहा, “राजन,कामधेनु गाय देना मेरे लिये संभव नहीं है। इस गौमाता की महत्ती कृपा से ही इस आश्रम तथा गुरुकुल का निर्बाध संचालन हो पा रहा है। यह हमारी सभी आवश्यकताओं को पूरा करती है। महल में तो ऐश आराम हेतु इसका दुरुपयोग ही होगा”। ब्रह्मर्षि के मना करने पर हठी राजा विश्वामित्र ने कामधेनु गाय को बलपुर्वक ले जाने का प्रयास किया। तो कपिला गाय के खुरों से असीम सैनिकों की उत्पत्ति हुई,जिससे विश्वामित्र को पराजित होकर खिन्न मन से अपने राज्य को लौटना पड़ा। द्वेष-भावना से प्रेरित होकर विश्वामित्र ने भगवान शंकर की तपस्या की और उनसे दिव्यास्त्र प्राप्त करके उन्होंने महर्षि वसिष्ठ पर पुन: आक्रमण कर दिया, किन्तु महर्षि वसिष्ठ के ब्रह्मदण्ड के सामने उनके सारे दिव्यास्त्र विफल हो गये। इस घटना के पश्चात् ही विश्वामित्र ने राजपाट का त्याग कर दिया। और उन्हे समझ आया कि ब्रम्ह तेज सत्ता की शक्ति से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है और प्रकृति के संसोधन समाज की आवश्यक्ताओं की पूर्ति क् लिए ही है ना कि भोग विलीस कू पूर्ति क् लिए तथा सत्ता के पूर्ण अधिकीर से उनकी दुरुपयोग ही होगा।

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